Story of victory in adversity amid Corona crisis: father had to sell land, laborer, son made engineer from IIT | कोरोना संकट के बीच विपरीत परिस्थितियों में जीत की कहानी: पिता को जमीन बेचनी पड़ी, मजदूरी की, बेटा आईआईटी से बना इंजीनियर

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20 मिनट पहले

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सफलता की परिभाषा सब के लिए एक नहीं होती है। हो भी नहीं सकती। अलग-अलग लोगों के लिए सफलता के अलग-अलग मायने होते हैं। किसी के लिए आईएएस ऑफिसर बनना सफलता है तो किसी के लिए खूब पैसा या शोहरत कमाना सफलता है, लेकिन कभी ऐसे भी दिन हुआ करते थे जब बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में रहने वाले राम भजन दो वक्त की रोटी की जुगाड़ को ही बहुत बड़ी सफलता और उपलब्धि समझते थे।

उनकी आर्थिक हालत इतनी खराब थी कि उनके माता-पिता पढ़ाई की बात तो सोच भी नहीं सकते थे। खेती के लिए अपनी कोई जमीन नहीं थी। दूसरों के खेतों में काम करते थे। मेहनत-मजदूरी करने के बाद जिस दिन घर में एक वक्त भी चूल्हा अच्छी तरह जल जाता तब पांच बच्चों समेत पूरा परिवार खुश हो जाता था। बड़ा लड़का पढ़ना चाहता था। सरकारी स्कूल में जाना शुरू भी किया, लेकिन आर्थिक संकट के चलते बेटे की पढ़ाई छूट गई। पेट भरने के लिए अब बड़ा बेटा भी पिता के साथ मजदूरी करने जाने लगा। कुछ साल और बीत गए। अब छोटे बेटे संजीत की बारी आई। वह भी पढ़ना चाहता था। उसने भी सरकारी स्कूल से अपनी पढ़ाई शुरू की।

पढ़ाई में खूब मन लगाता था संजीत। उसके लगन और परिश्रम को देखकर बड़े भाई और पिता ने निर्णय लिया कि चाहे जो हो जाए संजीत को काम पर नहीं ले जाएंगे। कितनी भी मुसीबतों का सामना करना पड़े, संजीत को पढ़ाएंगे जरूर। छोटी से झोपड़ी में एक दीये की रोशनी में देर रात तक संजीत पढ़ता रहता था। संजीत अब दसवीं में पहुंच चुका था। अगले वर्ष बोर्ड की परीक्षा थी। बड़ी मुश्किल से संजीत के पिता को कर्ज मिला और तब कहीं जाकर बोर्ड-परीक्षा का फॉर्म भरने के लिए पैसे का इंतजाम हुआ। संजीत दसवीं बहुत ही अच्छे अंकों से पास कर गया था। राम भजन बहुत खुश थे। उस दिन उन्होंने गांव में मिठाई भी बांटी थी। कोई पहली बार उनके परिवार में दसवीं पास किया था। लेकिन, अब आगे की पढ़ाई गांव से संभव नहीं थी।

संजीत इंजीनियर बनना चाहता था। कुल संपत्ति के नाम पर जो छोटी सी जमीन थी उन्होंने उसे भी बेच दिया और संजीत को उसी पैसे से पढ़ाई करने के लिए पटना भेज दिया। पैसे इतने कम थे कि उतने में किसी कोचिंग में एडमिशन भी संभव नहीं था। संजीत एक कमरा किराए पर लेकर रहने लगा। खुद खाना बनाता और फिर बचे हुये समय में पढ़ाई करता। कुछ ही दिनों में सभी पैसे ख़त्म हो गए। पिता ने कहा कि बेटा जो हो जाए मैं तुम्हें गांव वापस नहीं आने दूंगा। राम भजन अब पटना आ गए थे और बेटे के साथ ही रहने लगे। दिनभर पटना में ही जहां भी काम मिल जाता, मजदूरी करते थे और उसी पैसे से पिता-पुत्र का गुजारा होता था।

उधर गांव में संजीत का बड़ा भाई मजदूरी करके परिवार के लिए खाने-पीने की व्यवस्था कर रहा था। पटना में एक जगह भवन निर्माण का काम चल रहा था। वहीं राम भजन को काम मिल गया। एक दिन जब चंद पैसे के लिए देर रात तक काम कर रहे थे तब ठेकेदार ने इतनी मेहनत करने का उनसे कारण पूछा। कारण जानने के बाद ठेकेदार ने सुपर 30 के बारे में बताया। फिर क्या संजीत मेरा शिष्य बन गया। बहुत जल्दी ही सुपर 30 के सभी बच्चों से घुलमिल गया। आईआईटी का रिजल्ट आने वाला था मुझे आज भी याद है कि आईआईटी के रिजल्ट के दिन संजीत अपने पिता के साथ मेरे घर आया था। इतनी उत्सुकता थी कि राम भजन उस दिन काम पर नहीं गए थे। जैसे ही पता चला कि आईआईटी में संजीत का सलेक्शन हो गया है पिता-पुत्र गले लगकर खूब रोने लगे। यह सब देखकर मैं भावुक हो गया था। अब समय बदल गया है और संजीत की पढ़ाई भी आईआईटी से पूरी हो गई है। अब अच्छी नौकरी कर रहा है।

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