Banks are not serious about agricultural credit, 16.64% of the target was achieved; Banks argue – higher NPA in agricultural credit | कृषि ऋण को लेकर बैंक गंभीर नहीं, लक्ष्य का 16.64% ही हुआ हासिल; बैंकों की दलील- कृषि ऋण में एनपीए अधिक

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पटना9 मिनट पहले

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  • 31 मार्च तक 10 लाख किसानों को केसीसी देने का लक्ष्य था, दिए महज 1,66,434

बैंक बिहार में ऋण देने से परहेज करता है। यही कारण है कि राज्य का साख-जाम अनुपात राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। राज्य सरकार लगातार बैंकों पर ऋण वितरण बढ़ाने का दबाव देती रहती है, लेकिन बैंक बिहार में ऋण देने में गो स्लो की नीति पर काम करते रहता है।

अगर बात केवल कृषि ऋण की करें तो यह स्थिति और भी खराब है। वित्तीय वर्ष 2019-20 में कृषि क्षेत्र में कुल 60 हजार करोड़ रुपए का ऋण देने का लक्ष्य था,जिसके विरूद्ध 41449 करोड़ का वितरण किया गया। यह लक्ष्य का 69% है। किसानों के लिए कैश मुहैया करवाने का सबसे सहूलियत साधन किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) की स्थिति और भी खराब है।

61828 करोड़ के ऋण वितरण का लक्ष्य
वर्ष 2019-20 में 10 लाख नए किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड का वितरण किया जाना था, जबकि वितरित किए गए महज 166434 कार्ड ही। यानी लक्ष्य का 16.64% ही। जबकि वर्ष 2018-19 में यह उपलब्धि 21.92% थी। चालू वित्तीय वर्ष 2020-21 में कृषि क्षेत्र में 61828 करोड़ के ऋण वितरण का लक्ष्य रखा गया है।

बैंकों की दलील कृषि ऋण में एनपीए अधिक
पिछले कुल सालों से बैंकों के लिए गैर निष्पादन परिसंपत्तियां (एनपीए) परेशानी का सबब बन गया है। बिहार में अधिक से अधिक ऋण देने के सवाल पर बैंकों की दलील है कि एनपीए अधिक होता है। कृषि क्षेत्र में तो दूसरे क्षेत्रों की तुलना में एनपीए अधिक होने की संभावना रहती है। 31 मार्च 2020 के आंकड़ों के आधार पर देखे तो कृषि क्षेत्र में 25.48% एनपीए, उद्योग में 14.12% और अन्य प्राथमिकता क्षेत्र में 29.47% एनपीए था। पिछले साल बैंकों के 21847 करोड़ रुपए एनपीए थे, जो कुल ऋण का 14.92% है।
एक्सपर्ट की राय: राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी की वजह से नहीं मिल पाता लोन

सामाजिक-आर्थिक विशेषज्ञ डॉ. डीएम दिवाकर, बैंकों द्वारा किसानों को ऋण नहीं दिए जाने को, राज्य सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी बताते हैं। वे कहते हैं सरकार, किसानों को दिखाने के लिए केवल कृषि ऋण या केसीसी का लक्ष्य तय करती है। लेकिन यह लक्ष्य किस तरह से पूरा हो इसके लिए कोई यतन नहीं करती है। सरकार यह निर्धारित कर दे कि जो बैंक कृषि ऋण का लक्ष्य पूरा करेगा उसी में सरकारी राशि रखी जाएगी। लेकिन नौकरशाह ऐसा होने नहीं देगा। सरकार की अधिकांश राशि प्राइवेट बैंक में रहती है।

वहीं, खेती किसानी से जुड़े कौशल्या फाउंडेशन के कौशलेंद्र कुमार कहते हैं कि बैंकों द्वारा किसानों को ऋण नहीं देने के पीछे सबसे बड़ा कारण एनपीए हैं। और इसके लिए सरकार जिम्मेदार है। ऋण माफी योजना के इंतजार में बहुत किसान अदायगी में आनाकानी करते हैं।

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