- बाइक से तीन साल में नेपाल, चीन, तिब्बत, कजाखस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्की, फ्रांस और इंग्लैंड की यात्रा की
- 14 साल की उम्र से घूमना पसंद, कॉलेज समाप्त होने तक भारत के 25 राज्यों का भ्रमण पूरा किया
दैनिक भास्कर
Jul 06, 2020, 09:22 AM IST
आरा. (दीपक शास्त्री) आरा शहर के गोढ़ना रोड़ निवासी कुमार प्रशांत पर वसुधैव कुटुम्बकम् का ऐसा जुनून चढ़ा कि उन्होंने महज तीन साल में बाइक से 22 देशों की यात्रा कर ली। इस दौरान प्रशांत ने नेपाल, चीन, तिब्बत, कजाखस्तान, उज्बेकिस्तान, तुर्की, ग्रीस, मेसिडोनिया, चेक रिपबल्कि, जर्मनी, फ्रांस, स्कॉटलैंड और इंग्लैंड समेत 22 देशों की यात्रा की। इस यात्रा में प्रशांत ने बाइक से लगभग 45 हजार किलोमीटर की दूरी की। इन्होंने यह विश्वव्यापी यात्रा 15 जनवरी 2017 से यात्रा शुरु की।
प्रशांत ने 2018 में नेपाल और चीन की यात्रा महज एक हजार रुपये लेकर शुरू की थी। रास्ते में रुपयों की कमी हुई। प्रशांत बताते हैं कि हमलोग जहां जहां जाते गए और वहां-वहां कार्य करते गए । जिसके परिणाम स्वरुप आर्थिक मदद मिलती गई। कार्य करते हुए वहां का फोटो सोशल साइट्स पर डालते थे। जिसे देख लोग आर्थिक मदद करने को आगे आएं। उसी से हमलोगों ने यात्रा की। इस दौरान विभिन्न देशों के लोगो के साथ काम करने का अनुभव भी प्राप्त हुआ।
तिब्बत के पहाड़ों में खराब हो गई थी बाइक,खुद ही सुधारा
बकौल प्रशांत उनकी यात्रा का सबसे कठिन अनुभव तिब्बत के पहाड़ पर चढ़ने के दौरान का रहा। जिसकी ऊंचाई 5200 मीटर की थी और सफर के दौरान पहाड़ पर बर्फीली तूफान शुरु हो गई थी। दुर्भाग्यवश इसी बीच गाड़ी का ब्रेक लीवर टूट गया। गाड़ी धीरे-धीरे चलाना ही एक मात्र विकल्प था। इस समय कॉलेज के दिनों में रेसिंग कार पर काम करने का अनुभव काम आया जिससे इन्होंने बाइक को किसी प्रकार आगे बढ़ने लायक बना दिया।
दूसरा यादगार अनुभव ग्रीस में शरणार्थियों के कैंप का रहा। जहां ठंड से हालात बेकाबू हो गए थे। ऐसे ही अनेक अनुभवों के साथ इन्होंने स्कॉटलैंड तक की यात्रा पूरी की।
तिब्बत के हालात भी बयां किए
प्रशांत बताते है कि नेपाल के लोग अपने लोगों की तरह व्यवहार कर रहे थे। लेकिन, जब तिब्बत में पहुंचे तो वहां चीनी सैनिकों का तिब्बत के लोगों पर काफी प्रतिबंध था। जिसकी वजह से तिब्बत के आम नागरिक खुश नहीं है। आप चीनी सैनिक के आदेश के बिना कही खुले में घूम नही सकते, पेट्रोल पंप पर डीजल और पेट्रोल भी नही ले सकते। कई चेकपोस्ट पर चीनी सैनिकों ने मेरा का मोबाइल, कैमरा भी चेक किया। मैंने क्या-क्या तस्वीर ली इसकी भी जांच की गई। चीनी सैनिकों ने वहां कई चीजों पर प्रतिबंध लगा रखा है।
भारत के 25 राज्यों की यात्रा भी कर चुके हैं प्रशांत
ज्ञात हो कि प्रशांत पुणे में रहकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। इसमें इनका मन लग रहा था। इंजीनियरिंग के अंतिम साल में इन्होंने अपसाइकलिंग का काम शुरु कर दिया। इससे पूर्व 14 साल की उम्र से कॉलेज समाप्त होने तक इन्होंने भारत के 25 राज्यों का भ्रमण पूरा कर लिया था। प्रशांत बताते है मुझे इंजीनियरिंग से ज्यादा लोगों के बीच काम करने में मन लगता था। मैं हमेशा सोचता था कि लोगों के बीच में जाकर उनकी सेवा करुं। यही सोचते हुए 2017 में प्रशांत ने वासुदेवा राइड्स की शुरुआत की थी।
काफी मशक्कत करने के बाद हुआ वीजा का प्रबंध
विदेश की यात्रा करने में वीजा एक समस्या थी। इसको लेकर काफी जद्दोजहद भी हुई। बहुत सारे देशों के विश्वविद्यालयों ने प्रशांत के कार्य को देखते हुए अपने यहां आने का न्योता दिया। जिसकी वजह से वीजा आसानी से उपलब्ध होती रही। जिसमें लंदन यूनिवर्सिटी, बर्लिन यूनिवर्सिटी, मेसोडोनिया व अन्य देशों के विश्वविद्यालय शामिल है।
जगाना चाहते हैं रोजगार की अलख
बिहार में रोजगार एक समस्या है। इसको देखते हुए प्रशांत एक प्रोजेक्ट शुरू कर रहे है। जिसके माध्यम से यहां के लोगों को निशुल्क प्रशिक्षित किया जाएगा। ताकि वो स्वरोजगार का अवसर पैदा कर सकें। इसका मुख्य बिन्दु अपशिष्ट पदार्थ का इस्तेमाल कर नये-नये क्राफ्ट तैयार करना है। अपशिष्ट पदार्थ का इस्तेमाल कर प्रशांत ने गोढ़ना रोड़ में अपना घर भी बनाया है। इसमें विभिन्न देशों से आए लोगों ने उनका सहयोग भी किया।
प्रशांत के पिता जी सूरज कुमार उपाध्याय धनबाद रेलवे में सीनियर क्लर्क के पद पर कार्यरत है। माता मंजू देवी गृहिणी है। प्रशांत का कहना है कि हमें प्रकृति के साथ रहना और विकास करना सीखना होगा। हम प्रकृति का हिस्सा नही, हम प्रकृति है। कूड़ा-कचरा आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती है।
