नई दिल्ली: पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी (Pranab Mukherjee) की जिंदगी में गाय से जुड़ा एक किस्सा भी था, जो आपके लिए खासा दिलचस्प हो सकता है. प्रणब मुखर्जी पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में मिराती गांव में पैदा हुए थे. जिससे 2 मील दूर किरनार कस्बा था. हालांकि प्रणब मुखर्जी का परिवार नादिया के बिल्वग्राम से ताल्लुक रखता था लेकिन उनके दादा जी मिराती में कुछ जमीन खरीदकर वहीं बस गए थे.
प्रणब मुखर्जी के पिता कामदा किंकर मुखर्जी का गांव में काफी सम्मान था. उनके पिता भी उन्हीं लोगों में से थे जो गांधी जी के करिश्मे से प्रभावित होकर कांग्रेस से जुड़ गए थे. असहयोग आंदोलन चल रहा था, उसी दौरान प्रणब मुखर्जी के पिता 1920 में ही कांग्रेस से जुड़ गए थे. इस दौरान जेल जाना भी होता था और पुलिस भी उनके घर पर अक्सर आ धमकती थी. ऐसे में जब एक दारोगा से बालक प्रणब ने कहा कि ‘गाय तो हम खा गए’ तो वो काफी चौंक गया था.
प्रणब मुखर्जी के पिता धीरे-धीरे पूरी तरह से गांधी जी के भक्त बन गए थे और कांग्रेस में बेहद सक्रिय हो चले थे. उनको अजया नदी से मयूराक्षी नदी के बीच का क्षेत्र कांग्रेस ने सौंप दिया था. इन दोनों नदियों से करीब 25 से 30 मील की दूरी पर उनका गांव मिराती था. लाहौर अधिवेशन के बाद 26 जनवरी को कांग्रेस ‘स्वतंत्रता दिवस’ के तौर पर मनाने लगी थी, हर साल झंडा फहराकर स्वतंत्रता का संकल्प लिया जाता था, रावी की कसम दोहराई जाती थी.
ऐसे में प्रणब मुखर्जी के पिता अगर जेल में होते तो भी ये कार्यक्रम गांव में होता था. कभी प्रणब दा की मां, कभी भाई तो कभी प्रणब दा को ये मौका मिलता था. पिता जी की उस इलाके में प्रतिष्ठा बढ़ गई थी. जब भी किसी के बीच में झगड़ा होता था तो प्रणब मुखर्जी के पिता को ही मध्यस्थ के तौर पर बुलाया जाता था. इससे प्रणब दा भी सामाजिक रूप से काफी सक्रिय हो चले थे.
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उसी दौरान की एक दिलचस्प घटना है. एक बार प्रणब मुखर्जी के पिता तो जेल में थे लेकिन उनके घर का सामान जब्त करने पुलिस घर पर आ धमकी. हालांकि परिवार को इसकी जानकारी पहले ही मिल चुकी थी. उन्होंने सारा कीमती सामान, अनाज, पैसा, जरूरी कागजात और अपने घर की गाए अलग-अलग पड़ोसियों के घर भेज दी थीं, ताकि पुलिस के हाथ कुछ ना लग सके.
उस वक्त प्रणब मुखर्जी केवल 8 साल के थे. जब्ती करने आए दारोगा ने सोचा कि बड़े तो झूठ बोल सकते हैं लेकिन ये छोटा बच्चा जरूर सच उगल देगा.
दारोगा फौरन बालक प्रणब को अलग ले गया और चुपचाप पूछा कि तुम्हारे घर में तो कई गाय थीं, मैंने स्वयं उन्हें देखा है, अब कहां गईं? मासूमियत से बालक प्रणब ने जवाब दिया, गाय? उन्हें तो हम खा गए. दारोगा चौंका और बोला- क्या कह रहे हो? तुम तो हिंदू हो, गाय कैसे खा गए? तो बालक प्रणब ने जवाब दिया- जी वो पिता जी इतने समय से जेल में हैं तो हमने अपना पेट भरने के लिए सारी गाय बेच दीं.
दारोगा की उनकी बातें सुनकर हंसी छूट गई, वो वहां से मुस्कराकर चला गया. लेकिन ये बात ना उनके परिवार के लोग भूले और ना ही बड़े होने पर प्रणव मुखर्जी. तभी तो जीवन के उत्तरार्ध में जब उन्होंने अपनी बायोग्राफी लिखी तो उसमें सिलसिलेवार ढंग से गाय वाली बात समेत बचपन की कई घटनाओं के बारे में काफी दिलचस्पी से लिखा.
हालांकि आप इस घटना से ये भी समझ सकते हैं कि प्रणव मुखर्जी शुरुआत से ही मुश्किलों को झेलने और उनसे निपटने के आदी हो गए थे, जिसका फायदा उन्हें राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में मिला.
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