Jyotsna, managing director of Bharat Hotels, ex-IAS officer Baijal and Guha get relief from high court, stay on CBI court order | भारत होटल्स की प्रबंध निदेशक ज्योत्सना, पूर्व आईएएस अफसर बैजल और गुहा की गिरफ्तारी का संकट टला, हाईकोर्ट ने गैर जमानती वारंट को जमानती वारंट में बदला

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जोधपुर11 मिनट पहले

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उदयपुर की प्रसिद्ध लक्ष्मी विलास पैलेस होटल।

  • आरोपियों के विरूद्ध जारी गैर जमानती वारंट को जमानती वारंट में किया तब्दील
  • पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी की याचिकाओं पर नहीं हुई सुनवाई
  • हरीश साल्वे लंदन से तो मुकुल रोहतगी ने नई दिल्ली से वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए की पैरवी

(नरेश आर्य) . उदयपुर की प्रसिद्ध लक्ष्मी विलास पैलेस होटल के विनिवेश के मामले में भारत होटल्स लिमिटेड की प्रबंध निदेशक ज्योत्सना सूरी, विनिवेश मंत्रालय के पूर्व सचिव प्रदीप बैजल व लाजार्ड इंडिया लिमिटेड नई दिल्ली के तत्कालीन प्रबंध निदेशक आशीष गुहा की याचिकाओं पर मंगलवार को राजस्थान हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीश दिनेश मेहता ने सीबीआई कोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है।

हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश से अब इन आरोपियों पर गिरफ्तारी का संकट भी टल गया है। हाईकोर्ट ने इन आरोपियों के विरूद्ध सीबीआई कोर्ट की ओर से जारी किए गए गैर जमानती वारंट को जमानती वारंट तब्दील कर दिया है। साथ ही लक्ष्मी विलास पैलेस होटल को सीज करने के आदेश पर रोक लगा दी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी की याचिकाएं रजिस्टर्ड नहीं होने की वजह से उन पर सुनवाई नहीं हो पाई, हालांकि शौरी की ओर से सुनवाई करने का आग्रह किया, लेकिन कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया। भारत होटल्स लिमिटेड की प्रबंध निदेशक ज्योत्सना की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वकील हरीश साल्वे व राजस्थान हाईकोर्ट के अधिवक्ता उमेश कांत व्यास ने पैरवी की। साल्वे फिलहाल लंदन में है और वहां से वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए वे सुनवाई में शामिल हुए। उन्होंने दलील दी कि सीबीआई कोर्ट के आदेश में बहुत बड़ी त्रुटि है। साल्वे ने कहा, कि कोर्ट का आदेश सीबीआई द्वारा जांच के दौरान जुटाए साक्ष्य व रिकॉर्ड के बिल्कुल विपरीत है।सीबीआई द्वारा केस को बंद करने के लिए लगातार दो बार पेश की गई रिपोर्ट को अनदेखा किया गया है। इस तरह अधीनस्थ कोर्ट द्वारा जो फाइडिंग रिकॉर्ड की गई है, वह पूरी तरह से गलत है तथा स्पष्ट रूप से अपने क्षेत्राधिकार के बाहर जाकर यह आदेश दिया है। इसलिए इसमें हाईकोर्ट का हस्तक्षेप करना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि सीबीआई द्वारा 13 अगस्त 2019 को पेश की गई फाइनल रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख किया गया है, कि इस मामले में अभियोजन पक्ष के पास कोई साक्ष्य नहीं हैं। सीबीआई कोर्ट ने उसे अस्वीकार करते हुए जांच करने के आदेश दिए। इसके बाद जांच कर 5 जून 20 को सीबीआई ने फिर इसमें पूरक फाइनल रिपोर्ट पेश की और केस बंद करने का आग्रह किया। इसके बावजूद उसे स्वीकार नहीं कर याचिकाकर्ता के खिलाफ क्रिमिनल केस दर्ज करने तथा गिरफ्तारी वारंट से उपस्थित करने के आदेश दिए, जो कि पूरी तरह से विधि विरूद्ध है।
बिना दिमाग का इस्तेमाल किए जारी कर दिया गिरफ्तारी वारंट
बैजल की ओर से बहस करते हुए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी व राजस्थान हाईकोर्ट के अधिवक्ता निशांत बोड़ा ने कहा, कि याचिकाकर्ता वर्तमान में 77 साल के है तथा आईएएस से रिटायर्ड है। 35 साल सरकार को बेदाग सेवाएं दी है। वे ट्राई के चेयरमैन, मध्यप्रदेश में चुनाव आयुक्त व विनिवेश विभाग में सचिव जैसे कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे। अधिवक्ता ने इसके बाद तर्क दिया, कि बैजल को होटल के विनिवेश के मामले में गिरफ्तारी वारंट जारी नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह पुराना व प्रचलित कानून है, कि कोई भी कोर्ट इस तरह से किसी को भी गैर जमानती वारंट जारी नहीं कर सकती है।

इंदरमोहन गोस्वामी बनाम उत्तराखंड तथा रघुवंश देवचंद भसीन बनाम महाराष्ट्र मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्धारित कर रखा है, कि समन जारी करने से पूर्व प्रथम अवस्था में गिरफ्तारी वारंट जारी नहीं किया जा सकता है। चूंकि गैर जमानती वारंट का निष्पादन सीधे रूप से किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करने से जुड़ा है। इसे केवल केस के तथ्य व परिस्थितियों में संतुष्ट होने के बाद ही जारी किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी तर्क दिया, कि ऐसे परिस्थितियों में गैर जमानती वारंट जारी किया जाता है तब व्यक्ति के स्वेच्छा से कोर्ट में उपस्थित नहीं होने की आशंका हो या पुलिस समन देने के लिए ढूंढ़ने में असमर्थ है या उस व्यक्ति को तुरंत कस्टडी में नहीं लिया तो वह किसी को नुकसान पहुंचा सकता है।

उनके याचिकाकर्ता के साथ ऐसी कोई परिस्थिति नहीं थी। अधीनस्थ कोर्ट ने बिना दिमाग का इस्तेमाल किए गिरफ्तारी वारंट के आदेश जारी कर दिए, जो कि अनुचित है। इसलिए 15 सितंबर को जारी किए गए आदेश को अपास्त किया जाए। जस्टिस मेहता ने गत 15 सितंबर को सीबीआई कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी। इससे अब इन तीनों आरोपियों को गिरफ्तारी से राहत मिल गई है। हालांकि कोर्ट उनके विरूद्ध जारी गैर जमानती वारंट को जमानती वारंट में तब्दील किया है। साथ ही लक्ष्मी विलास पैलेस होटल को सीज करने के आदेश पर रोक लगा दी है।
शौरी की याचिकाओं पर नहीं हुई सुनवाई
सीबीआई कोर्ट ने पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी के विरूद्ध भी क्रिमिनल केस दर्ज करने के आदेश दिए हैं। इस आदेश को शौरी ने चुनौती दी है तथा गिरफ्तारी पर रोक लगाने का आग्रह किया है। यह याचिकाएं सोमवार को पेश कर दी गई थी, लेकिन रजिस्टर्ड नहीं हुई थी। इस वजह से सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हुई है। हालांकि शौरी की ओर से सुनने का आग्रह किया गया, लेकिन याचिका रजिस्टर्ड नहीं होने से सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया है।
यह था मामला
सीबीआई कोर्ट ने गत 15 सितंबर को प्रसंज्ञान लेते हुए सीबीआई कोर्ट की क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था तथा 252 करोड़ रुपए के लक्ष्मी विलास पैलेस होटल को महज 7.50 करोड़ रुपए में बेचकर सरकार को 244 करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाने के मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी, भारत होटल्स लिमिटेड की प्रबंध निदेशक ज्योत्सना सूरी, पूर्व आईएएस अफसर प्रदीप बैजल, आशीष गुहा व कांतिलाल कर्मसे के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए थे। इसके अलावा इन सभी गिरफ्तारी वारंट से तलब भी किया गया था। सीबीआई का आदेश आते ही हड़कंप मच गया। कोर्ट के आदेश के बाद उदयपुर कलेक्टर ने होटल को अपने पजेशन में ले लिया और संपत्ति का सत्यापन का काम चल रहा है।

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