अलवर39 मिनट पहले
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- पाकिस्तान से आकर सिलाई की, 1960 में जनसंघ से जुड़कर राजनीति में आए
सन् 1947 में मेरी उम्र 15 साल थी। डेरा गाजी खान (पाकिस्तान) के राजकीय हाई स्कूल में कक्षा 9वीं में पढ़ता था। परीक्षा हाेने के बाद मई जून में छुट्टी हाेने पर पैतृक घर ग्राम रामण आ गया। वहां पूरा परिवार रहता था। पिताजी भवानीदास गांधी व्यापारी थे। मेरे आने के कुछ दिनाें बाद ही गांव में झगड़े शुरू हाे गए। इस कारण पिताजी ने मुझे पढ़ने के लिए फिर स्कूल नहीं भेजा। गांव में हिंदू और मुस्लमान सभी रहते थे। 15 अगस्त काे बंटवारा हाे गया।
आस-पड़ाेस में झगड़े हाे रहे थे। उपद्रवी घराें काे आग लगा रहे थे। भय का वातावरण हाेने के कारण 3 सितबंर 1947 काे घर-बार छाेड़कर दाे-चार बर्तन और कपड़ाें के साथ पिताजी परिवार सहित गाेरखा मिलट्री के ट्रक से डेरा गाजी खान आ गए। मिलिट्री का ट्रक हाेने के कारण उपद्रवियाें ने हमारे ट्रक पर पत्थर नहीं फेंके। करीब एक महीने हम डेरा गाजी खान में रहे। अक्टूबर महीने में डेरा गाजी खान से अटारी बाॅर्डर हाेते हुए ट्रेन से शाहबाद (अंबाला) आए।
हमने ट्रेन की छत पर बैठकर यात्रा की। उस समय हालात बहुत खराब थे। दंगाई चलती ट्रेन पर पत्थर फेंक रहे थे। जिन्हें साधन नहीं मिला, वे पैदल ही चल रहे थे। अलवर में रेलवे स्टेशन के पास स्थित फतेहजंग गुंबद में लगे शिविर में हम सब लाेग ठहरे। इस शिविर में खाने और पानी की व्यवस्था थी।
शिविर में रुकने के दाैरान 3 दिनाें में मेरे दाे भाइयाें किशन और हेतराम व माताजी राधाबाई का निधन हाे गया। अलवर आते समय ये तीनाें रास्ते में बीमार हाे गए थे। ट्रेन में पानी और खाने की व्यवस्था नहीं थी। मेरे दाे भाइयाें और माताजी का निधन हाेने के बाद पिताजी का मन दुखी हाे गया था। हम 4-5 दिन बाद ही अलवर से हरियाणा के पलवल चले गए। 5-6 महीने बाद पलवल में मेरे पिताजी भवानीदास का निधन हाे गया।
मई 1948 में मैं भाइयाें के साथ अलवर में रिश्तेदाराें के पास आ गया। अलवर में छाजूसिंह की गली में रहने के लिए मकान मिला, जाे उस समय कच्चा था। बाद में हमने पक्का मकान बनवाया। छाजूसिंह की गली में ही हमारे साथ पाकिस्तान से आए मिलने वाले काफी लाेग रहते थे, इसलिए हमने भी यहां रहने की साेची थी। अलवर आने के बाद मैंने चीनी के बर्तन बनाने वाली फैक्ट्री में नाैकरी की। कुछ दिनाें बाद मैंने फैक्ट्री छाेड़कर भाई के साथ कपड़े सिलाई का काम करना शुरू किया। सन् 1960 में मैं जनसंघ से जुड़ा और शाखाओं में जाने लगा। इसके बाद राजनीति में आ गया। (जैसा तिलकराज गांधी ने भास्कर काे बताया)
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