DNA ANALYSIS: Investigative report of kanpur encounter | DNA ANALYSIS: किसकी ‘शरण’ में 8 पुलिसवालों का कातिल? भारत के भ्रष्ट तंत्र का विश्लेषण

नई दिल्ली: आज हम कानपुर में गैंगस्टर विकास दुबे और उसके साथियों द्वारा की गई 8 पुलिस वालों की हत्या का विश्लेषण करेंगे. ये एनकाउंटर भारत के भ्रष्टतंत्र का सबसे बड़ा उदाहरण है. इस घटना से सवाल उठता है कि सीमा पर चीन की घुसपैठ से तो हम निपट लेंगे लेकिन हमारे देश में बैठे सिस्टम के दुश्मनों का हम क्या करेंगे? विकास दुबे जैसे कुख्यात अपराधी भारत के हर राज्य में हैं, हर शहर में हैं और हर जगह. अपराधियों के साथ मिलिभगत करने वाले नेता और पुलिस वाले भी होते हैं. इसलिए आज हम ये समझने की कोशिश करेंगे कि ऐसे में देश की आम जनता को इंसाफ मिलने के आखिर कितने चांस है?

लेकिन सबसे पहले आप इस घटना के चार किरदारों को समझिए पहला किरदार है कुख्यात अपराधी विकास दुबे. जिसने सिस्टम को अपना गुलाम बना लिया था. दूसरे किरदार में हैं वो पुलिस वाले जिन्होंने विकास दुबे से हाथ मिला लिया था, तीसरे किरदार में वो नेता हैं जिनकी शरण में विकास दुबे जैसे अपराधी फलते फूलते हैं और चौथा किरदार उन ईमानदार पुलिस वालों का है जो अपनी ईमानदारी की कीमत जान देकर चुकाते हैं. इन चार किरदारों पर ही भारत की पूरी नींव टिकी हुई है.

कानपुर के एक ग्रामीण इलाके में पुलिस की एक टीम का एक अपराधी को पकड़ने जाना, एनकाउंटर में 8 पुलिस वालों का शहीद हो जाना और एक गैंगस्टर का भाग जाना. ऐसी कहानियां आपने 50 के दशक से लेकर अब तक आई फिल्मों में देखी होंगी, किताबों में पढ़ा होगा. लेकिन 2 जून की रात कानपुर में ये सब सच हो गया. अब आप सोचिए कि अगर कोई आम आदमी या पुलिस वाला विकास दुबे जैसे अपराधी का शिकार हो जाए तो उसे न्याय मिलने के कितने चांस हैं? और अगर कोई साहसी पुलिस वाला न्याय दिलाने की कोशिश भी करेगा तो उसकी जान की गारंटी क्या होगी?

कहा जाता है कि 1990 में जब विकास दुबे ने अपराध की दुनिया में कदम रखा था तब उसे स्थानीय नेताओं का भरपूर सहयोग मिला और फिर करीब 30 वर्षों तक विकास दुबे ने इन नेताओं का खूब दोहन किया और अपनी ताकत और प्रभाव बढ़ाता चला गया. इसका नतीजा ये हुआ कि नेताओं के इशारे पर काम करने के आदी पुलिस वाले विकास दुबे को पकड़ने की बजाय उसे बचाने के काम में जुट गए. यानी पहले विकास दुबे इस भ्रष्ट सिस्टम का हिस्सा बना और फिर धीरे-धीरे पूरे सिस्टम ने उसके सामने आत्म समर्पण कर दिया.

2 जून की रात को उत्तर प्रदेश पुलिस की एक टीम विकास दुबे को पकड़ने उसके गांव गई थी. लेकिन विकास दुबे को इसकी सूचना पहले ही मिल गई और आरोपों के मुताबिक ये सूचना देने वाले कोई और नहीं बल्कि अलग-अलग थानों के पुलिस वाले थे.

इस सूचना का फायदा उठाकर विकास दुबे और उसके गुंडों ने गांव जाने वाले रास्तों को बंद कर दिया. वहां JCB मशीनें खड़ी कर दीं. जिसकी वजह से पुलिस वालों को अपनी गाड़ियों से उतरकर पैदल ही गांव की तरफ जाना पड़ा. इस दौरान रास्ते में लगी लाइटों को भी बुझा दिया गया और अंधेरे का फायदा उठाकर विकास दुबे और उसके 40 से 50 गुंडों ने पुलिस वालों पर फायरिंग शुरू कर दी. पुलिस वाले नीचे थे और ये अपराधी घरों की छतों से फायरिंग कर रहे थे. इसलिए पुलिस वाले आसानी से अपराधियों की गोलियों का निशाना बन गए.

इस गोली बारी में सर्कल ऑफिसर देवेंद्र मिश्र और स्टेशन ऑफिसर महेश चंद्र यादव समेत 8 पुलिस वाले शहीद हो गए. जबकि 7 पुलिस वाले घायल हो गए. इस घटना के बाद से पुलिस की तैयारियों पर भी सवाल उठ गए हैं और पूछा जा रहा है कि क्या विकास दूबे को पकड़ने गए पुलिस वालों को SOP की जानकारी नहीं थी. हमने इस घटना पर एक ग्राउंड रिपोर्ट तैयार की है जिससे आपको इस एनकाउंट पर उठ रहे हर सवाल का जवाब मिल जाएगा.

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