नई दिल्ली: भारत में चुनावों के दौरान कुछ राजनीतिक पार्टियां वोटर्स को Smart Phones बांटती हैं. लोगों को लुभाने के लिए कंबल, कैश, शराब, ड्रग्स, और यहां तक कि मुफ्त जानवर भी बांटे जाते हैं. इसके अलावा आरक्षण, जाति, धर्म और तुष्टिकरण के जरिए भी चुनाव जीते जाते हैं. लेकिन चुनावों के नाम पर भ्रष्टाचार की ये कहानी नई नहीं है बल्कि इसकी शुरुआत आजादी के साथ ही हो गई थी. 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में नियमों के उल्लंघन और बूथ कैप्चरिंग के 1 हज़ार 250 मामले दर्ज किए गए थे. वर्ष 1954 में जब धांधली वाले 42 पोलिंग स्टेशन्स पर फिर से वोट डाले गए तो बूथ कैप्चरिंग और नियमों के उल्लंघन के मामले बढ़कर 6 हज़ार 358 हो गए.
जब भारत में EVM से वोटिंग नहीं होती थी. तब Ballot यानी मतपत्र के जरिए वोट डाले जाते थे. ये मतपत्र कागज़ के बने होते थे और इन्हें Ballot Boxes में रखा जाता था. कई बार स्थानीय नेता चुनाव जीतने के लिए बूथ कैप्चरिंग करा लेते थे और फिर असली मतदाताओं की जगह नकली मतदाता वोट डालते थे. इसके बाद स्थानीय नेता इन्हीं के दम पर चुनाव जीत जाता था. भारत में आधिकारिक तौर पर बूथ कैप्चरिंग की पहली घटना1957 में बिहार के बेगुसराय में दर्ज की गई थी. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इसकी शुरुआत पहले लोकसभा चुनाव से ही हो गई थी.
हालांकि ये सिलसिला अब भी नहीं रुका है. वर्ष 2018 में जब पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव हुए तो पूरे राज्य में बूथ कैप्चरिंग की कई घटनाएं हुईं. कहीं Ballot Boxes को जला दिया गया तो कहीं जनता के वोटों को पानी में फेंक दिया गया. इस तरह की धांधली और भ्रष्टाचार का नतीजा ये होता है कि बहुत सारे बाहुबली और अपराधी भी चुनाव जीत जाते हैं. लेकिन जब देश में पहले लोकसभा चुनाव हुए थे तो देश की जनता ने कई ऐसे नेताओं को भी हरा दिया था. जिनका कद बहुत बड़ा था. इनमें संविधान निर्माता डॉक्टर भीम राव अंबेडकर, आचार्य कृपलानी और मनमोहिनी सहगल जैसे नेता भी शामिल थे. मनमोहिनी सहगल देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की रिश्तेदार थीं.
आजादी के 73 साल भी अंग्रेजियत से आजाद नहीं हो पाया देश
भारत ने ना सिर्फ आजादी के बाद अनुशासन को भुला दिया बल्कि धीरे धीरे अपनी असली पहचान का भी तिरस्कार कर दिया. वो पहचान जिसे हासिल करने के लिए भारत ने 200 वर्षों तक संघर्ष किया था. इसी पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है भाषा. भारत में 22 आधिकारिक भाषाएं हैं जबकि बोलियों और क्षेत्रीय भाषाओं की संख्या 19 हज़ार 500 है. लेकिन फिर भी जिस अकेली भाषा के पीछे पूरा भारत दौड़ रहा है अंग्रेजी है. अंग्रेजों के जाने के बाद भी..भारत के लोग अंग्रेजी के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाए. शायद यही वजह थी कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने जब भारत के आजाद होते ही संसद के सेंट्रल हॉल में अपना पहला एतिहासिक भाषण दिया तो इसके लिए उन्होंने अंग्रेजी को चुना.
जब भारत आजाद हुआ तब भारत की जनसंख्या 33 करोड़ थी और इनमें से सिर्फ 18 प्रतिशत लोग ही साक्षर थे. यानी भारत की 82 प्रतिशत जनता उस समय अनपढ़ थी. इन पढ़े लिखे लोगों में से भी सिर्फ कुछ मुट्ठी भर लोग ही अंग्रेजी जानते थे. फिर भी देश के पहले प्रधानमंत्री ने अपना पहला भाषण अंग्रेजी में ही दिया और इसका परिणाम ये है कि आज भी भारत के करोड़ों लोग अंग्रेजी को ही सफलता की गारंटी मानते हैं. लेकिन ये सच नहीं है. भारत इन 73 वर्षों में अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या के मामले में दुनिया में अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर तो आ गया.लेकिन भारत के ज्यादातर लोगों ने अपनी भाषाओं और जड़ों को भुला दिया. जबकि इसी दौरान चीन, जर्मनी और जापान जैसे देशों ने कभी अपनी मातृभाषा का साथ नहीं छोड़ा.
चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है.लेकिन वहां सिर्फ 1 प्रतिशत लोग अंग्रेजी बोलना जानते हैं. इसी तरह जापान दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है.लेकिन वहां की सिर्फ 2 प्रतिशत जनता ही धारा प्रवाह अंग्रेज़ी बोलने में सक्षम है. जबकि जर्मनी में सिर्फ 0.34 प्रतिशत जनसंख्या ऐसी है जिसकी मातृभाषा अंग्रेजी है यानी जर्मनी की 99.66 प्रतिशत जनसंख्या अपनी मातृभाषा में ही बात करती है. इसके बावजूद अर्थव्यवस्था के मामले में दुनिया में चौथे नंबर पर है. अंग्रेजी को सफलता की कुंजी बताने वाला विचार ना सिर्फ एक झूठ है बल्कि इस झूठ के दम पर भारत की अपनी भाषाओं के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है. भारत की भाषाओं की ये दुर्गति इसलिए भी हुई है क्योंकि अंग्रेजों के जाने के बाद जिन लोगों के कंधों पर भारत का सिस्टम चलाने की जिम्मेदारी थी. वो अपनी ही दुनिया में खोए हुए थे. अंग्रेज भारत के इन अधिकारियों को बाबू कहकर बुलाते थे और ये बाबू इस उपाधि को किसी मेडल जैसा समझकर बाबूगिरी में व्यस्त रहे.
अंग्रेजों की शुरू की हुई बाबूगिरी ने देश को पहुंचाया नुकसान
लेकिन सरकारी अधिकारियों को बाबू कहने की शुरुआत कैसे हुई. इसे लेकर काफी विवाद है. सबसे प्रचलित मान्यता ये है कि अंग्रेज भारतीयों के भूरे रंग की वजह से हमारी तुलना बंदरों की एक प्रजाति Baboon से करते थे. इस प्रजाति के बंदर भी भूरे रंग के होते हैं. लेकिन धीरे धीरे Baboon शब्द बाबू में बदल गया और भारत के सरकारी अफसरों ने इसे किसी सम्मान की तरह स्वीकार कर लिया. एक ज़माने में ये बाबू शब्द किसी उपाधि की तरह इस्तेमाल होता था और समाज में जिस व्यक्ति का पद और रसूख अच्छा होता था. उसे लोग अक्सर बाबू कहकर बुलाते थे . यानी अंग्रेजों ने जिस शब्द के जरिए भारतीयों के रंग और पहचान का मज़ाक उड़ाया. उस शब्द से हमें गर्व की अनूभूति होने लगी.
अंग्रेजों की गुलामी का असर सिर्फ हमारी भाषा पर ही नहीं पड़ा बल्कि हमारी संस्कृति का भी धीरे धीरे अंग्रेजीकरण हो गया. यही वजह है कि भारत में आज भी बहुत सारे लोग अंग्रेजों को ही अपना वैचारिक पूर्वज मानते हैं. हमारा पहनावा बदल गया, हमारी सोच बदल गई. हमारे तौर तरीके अंग्रेजों जैसे हो गए और हमने धीरे धीरे अपनी असली पहचान को खो दिया. उदाहरण के लिए आज भारत के लोग जो कपड़े पहनते हैं. उसमें से 25 प्रतिशत कपड़े पश्चिमी होते हैं. भारत में अब बहुत सारे लोग होली और दीवाली जैसे त्योहारों की जगह क्रिसमस, Halloween और Valentine जैसे त्योहार मनाने लगे हैं.
भारत के लोगों का खान पान भी बदल गया है. भारत के गोलगप्पों और Curry की रेसिपी जानने के लिए अंग्रेज बेकरार हैं लेकिन भारत के लोगों का झुकाव Pizza, Burger, और Tacos जैसे पश्चिमी भोजन की तरफ हो रहा है. इस बदलती पसंद का नतीजा ये हुआ है कि भारत में मोटापा धीरे धीरे महामारी की शक्ल लेने लगा है जबकि ब्रिटेन जैसे देश के प्रधानमंत्री Made In India Cycle चलाकर…अपने देश के लोगों को स्वस्थ रहने का संदेश दे रहे हैं. संस्कृति के पश्चिमीकरण ने भारत की संस्कृति को इस हद तक बदल दिया है कि अब भारतीय संस्कृति जैसी चीजें सिर्फ पुस्तकों का हिस्सा बनकर रह गई हैं. बड़े-बुजुर्गों को सम्मान और आदर देने जैसी बातों को अब पिछड़ेपन की निशानी माना जाने लगा है. बांसुरी, तबला, हारमोनियम, वीणा और सितार जैसे भारतीय Music Instruments की जगह Guitar, Drums और Piano ने ले ली है.
अंग्रेजियत ने देश की युवा पीढ़ी को जड़ों से काटा
इस अंग्रेजीकरण का नुकसान देश की युवा पीढ़ी को भी हो रहा है. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 27 करोड़ युवा ऐसे हैं जो नियमित तौर पर ड्रग्स और दूसरे नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं और अब इसके आदी हो चुके हैं. विदेशी गानों और संगीत में ड्रग्स को शान की बात के तौर पर दिखाया जाता है. भारत के संगीत में भी शराब, ड्रग्स और सिगरेट जैसी चीज़ों की एंट्री हो चुकी है. संस्कृति के अलावा भारत की शिक्षा व्यवस्था भी आज तक अंग्रेजों की गुलाम बनी हुई है. नई शिक्षा नीति के जरिए इससे बदलने की कोशिश तो की गई है लेकिन 73 वर्षों में इसकी वजह से जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई कौन करेगा.
आज भी हमारे देश में एक वर्ग ऐसा है जो अंग्रेजी के भारी भरकम शब्दों का इस्तेमाल करके ब्रिटेन और अंग्रेजों की वंदना करता रहता है. दरबारी इतिहासकार भी इसी वर्ग का हिस्सा हैं और इन लोगों ने तथ्यों और इतिहास को इस तरह से बदल दिया. जिससे ब्रिटेन पर लगे दाग मिटाए जा सकें. इन लोगों ने ब्रिटेन द्वारा शुरु किए गए रेलवे को भारत के लोगों के लिए तोहफा बताना शुरू कर दिया.
यहां तक कहना शुरू कर दिया कि अगर अंग्रेज़ भारत नहीं आते तो भारत कई हिस्सों में बंट चुका होता. जबकि सच ये है कि अंग्रेजों के भारत आने के बाद देश तीन हिस्सों में बंट गया. एक आज का भारत है जबकि बाकी दो हिस्सों के नाम हैं पाकिस्तान और बांग्लादेश.
दरबारी इतिहासकार और पत्रकार ये तर्क भी देते हैं कि अंग्रेजों ने भारत का परिचय लोकतंत्र से कराया. लेकिन सच ये है कि अंग्रेज़ों ने भारत की लोकतांत्रिक प्रथाओं को सिर्फ़ नष्ट करने का काम किया. भारत के जो लोग सदियों से एक साथ रहते आए थे, उनमें फूट डाल दी. अंग्रेज़ भारत के लोगों को अपने से कमतर मानते थे और वो चाहते थे कि इसी आधार पर भारत के लोग आपस में बंट जाए. अंग्रेज़ों ने लोकतंत्र के नाम पर ऐसे कानूनों का निर्माण किया जो आज भी भारत में भेदभाव का आधार बने हुए हैं.
73 साल से लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति को ढो रहा है देश
माना जाता है कि भारत में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की शुरुआत Lord Macaulay ने की थी और उन्होंने अंग्रेजी को भारत में काम काज की भाषा बनाने पर जोर दिया. ब्रिटिश राज की तारीफ़ करने वाले कहते हैं कि अगर ब्रिटेन ने भारत को गुलाम ना बनाया होता तो भारत के लोग अशिक्षित रह जाते और अंग्रेजी बोलने में सक्षम नहीं होते.लेकिन सच ये है कि Lord Macaulay ने शुरुआत एक खास मकसद से की थी. उन्होंने इस विषय पर एक बार कहा था कि हमें एक ऐसा वर्ग बनाना है जो हमारे और उन लोगों के बीच अनुवादक का काम करे जिन्हें हमने अपना गुलाम बनाया है. यानी ज्यादातर पढ़े लिखे और अंग्रेजी बोलने वाले भारतीयों का इस्तेमाल अंग्रेज सिर्फ एक अनुवादक के तौर पर करना चाहते थे. इसलिए हम कह रहे हैं कि जिन अंग्रेजों ने भारत के लोगों का दमन किया और भारत को दिवालिया कर दिया. उन अंग्रेजों के चश्मे से लिखे गए इतिहास और उनके द्वारा स्थापित की गई शिक्षा व्यवस्था को बदलने की जरूरत है.
आजादी के वक्त नोआखली में सांप्रदायिक दंगे रोकने में लगे थे महात्मा गांधी
भारत में आजादी के सूत्रधारों में सबसे बड़ा नाम महात्मा गांधी का था.जिन्होंने इस आजादी के लिए कई दशकों तक संघर्ष किया. लेकिन जब आप 15 अगस्त 1947 और उसके बाद आयोजित कार्यक्रमों की तस्वीरें देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि उनमें महात्मा गांधी कहीं नहीं हैं. दरअसल महात्मा गांधी आजादी के दिन दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर बंगाल के नोआखली में थे. जहां वो हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा रोकने के लिए अनशन कर रहे थे. नोआखली में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सौहार्द कायम करने के लिए गांधी जी गांव-गांव घूम रहे थे. आजादी से कुछ सप्ताह पहले की बात है. जब नोआखाली में बंटवारे की वजह से हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़के हुए थे. पंडित जवाहर लाल नेहरु और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कोलकाता में गांधी जी के पास अपने एक दूत के जरिये एक पत्र भेजा.
उस पत्र में लिखा था कि 15 अगस्त हमारा पहला स्वाधीनता दिवस होगा. आप राष्ट्रपिता हैं और हम चाहते हैं कि आप दिल्ली आकर हमें अपना आशीर्वाद दें. पत्र पढ़ने के बाद महात्मा गांधी ने कहा कि – कितनी मूर्खता पूर्ण बात है. जब बंगाल जल रहा है. हिंदू और मुस्लिम एक दूसरे की हत्याएं कर रहे हैं. मैं कोलकाता के अंधकार में उनकी चीखें सुन रहा हूं. तब मैं कैसे दिल में रोशनी लेकर दिल्ली जा सकता हूं. गांधी जी ने कहा कि बंगाल में शांति कायम करने के लिए मुझे यहीं रहना होगा और अगर जरूरत पड़ी तो सौहार्द और शांति स्थापित करने के लिए मैं अपनी जान दे दूंगा. बंटवारे और उसके बाद देशभर में हुए दंगों से गांधी जी इतने आहत थे कि आजादी से एक दिन पहले अपनी प्रार्थना सभा में गांधी जी ने कहा था कि हम कल आजाद हो जाएंगे लेकिन देश दो टुकड़ों में बंट जाएगा.
